भूल जाओ ...




भूल जाओ ...

दुसरे के द्वारा तुम्हारा कभी कोई अनिष्ट हो जाय तो उसके लिये दुःख न करो; उसे अपने पहले किये हुए बुरे कर्म का फल समझो, यह विचार कभी मन में मत आने दो कि 'अमुकने मेरा अनिष्ट कर दिया है, यह निश्चय समझो कि ईश्वरके दरबार में अन्याय नहीं होता, तुम्हारा जो अनिष्ट हुआ है या तुम पर जो  विपत्ति आयी है, वह अवश्य ही तुम्हारे पूर्वकृत कर्म का फल है, वास्तवमें बिना कारण तुम्हे कोई कदापि कष्ट नहीं पहुँचा सकता ! न यही सम्भव है कि कार्य पहले हो और कारण पीछे बने, इसलिये तुम्हे जो कुछ भी दुःख प्राप्त होता है, सो अवश्य ही तुम्हारे अपने कर्मों का फल है; ईश्वर तो तुम्हे पापमुक्त करनेके लिये दयावश न्यायपूर्वक फल का विधान करता है ! जिसके द्वारा तुम्हे दुःख पहुँचा है उसे तो केवल निमित्त समझो; वह बेचारा अज्ञान और मोहवश निमित्त बन गया है; उसने तो अपने ही हाथों अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी है और तुम्हे कष्ट पहुँचानेमें निमित्त बनकर अपने लिये दु;खों को निमन्त्रण दिया है; यह तो समझते ही होंगे कि जो स्वयं दु:खो कों बुलाता है वह बुद्धिमान् नहीं है, भुला हुआ है; अतः वह दया का पात्र है ! उस पर क्रोध न करो, बदले में उसका बुरा न चाहो, कभी उसकी अनिष्टकामना न करो, बल्कि भगवान् से प्रार्थना करो कि हे भगवन् ! इस भूले हुए जीव को सन्मार्ग पर चढ़ा दो! इसकी सदबुद्धिको जाग्रत कर दो; इसका भ्रमवश किया हुआ अपराध क्षमा  करो ! 

॥ हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥
॥ O' My Lord! May I find you lovable, May I find you lovable! ॥

भगवान शिव द्वारा प्रभु श्रीराम की स्तुति

*भगवान शिव द्वारा प्रभु श्रीराम की स्तुति *

जय राम रमारमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ।।
अवधेश सुरेश रमेश बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥1॥

दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ।।
रजनीचर बृंद पतंग रहे ।सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥2॥

महि मंडल मंडन चारु तरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ।।
मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥3॥

मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ।।
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे ॥4॥

बहुरोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ।।
भव सिँधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥5॥

अति दीन मलीन दुखी नितही । जिन्हके पद पंकज प्रीति नहीँ ।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह केँ । प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके ॥6॥

नही राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह के सम वैभव वा बिपदा ।।
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥7॥

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ।।
सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥8॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ।।
तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥9॥

गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीनजनं ॥10॥

दोहः-
बार बार बर मागहुँ हरषि देहु श्रीरंग । पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥14 A॥
बरनी उमापति राम गुन हरषि गये कैलास । तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुख प्रद बास ॥14 B॥

"भजन"

भजन उसी को कहते हैं, जिसमें भगवान् का सेवन हो तथा सेवन भी वही श्रेष्ठ है, जो प्रेमपूर्वक मन से किया जाय | मन से प्रभु का सेवन तभी समुचितरूप से प्रेमपूर्वक होना संभव है, जब हमारा उनके साथ घनिष्ठ अपनापन हो और प्रभु से हमारा अपनापन तभी हो सकता है, जब संसार के अन्य पदार्थों से हमारा सम्बन्ध और अपनापन न हो |
॥ हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥
॥ O' My Lord! May I find you lovable, May I find you lovable! ॥
 By Swami Ramsukhdasji...
 

भगवान को सब अर्पण कर दो...

अपना तन-मन-धन सब भगवान के अर्पण कर दो, तुम्हारा है भी नहीं, भगवान का ही है | अपना मान बैठे हो- ममता करते हो इसीसे दुखी होते हो | ममता को सब जगह से हटाकर केवल भगवान के चरणों में जोड़ दो, अपने माने हुए सब कुछ् को भगवान के अर्पण कर दो | फिर वे अपनी चीज को चाहे जैसे काम में लावें, बनावें या बिगाडें | तुम्हें उसमें व्यथा क्यों होने लगी? भगवान को समर्पण करके तुम तो निश्चिंत और आनंदमग्न हो जाओ |....

हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं !!

  Ram Putra Angad Das