गीता जी का महत्त्व




||श्रीहरिः॥
* गीताजी की आज्ञा भगवानकीआज्ञा समझनी चाहिए।

* मेरी दृष्टिमेँ गीतासे बढ़कर संसारमेँ और कोई शास्त्र है ही नहीँ, गीता वेदसे भी बढ़कर है।

*गीता भगवानकी साक्षात वाङ्गमयी मूर्ति है

*गीता भगवानके साक्षात श्वास है


*गीताजीका अर्थसहित, भावसहित अवश्य ही मनन करना चाहिए।


*गीता हमलोगोँको त्याग सिखलाती है-आसक्तिका त्याग, अहंताका त्याग, ममताका त्याग


*जिस तरह भगवानका सबमेँ प्रवेश है यानी भगवान व्यापक हैँ,उसी तरह अपने लोगोँका गीतामेँ प्रवेश होना चाहिए यानी हमारे रोम-रोममेँ गीता होनी चाहिए।


*कल्याण तो इनमेँसे किसी एक ही बातसे हो जाय-
()गीताजीमेँ प्रवेश हो जाय,बस इतनेमेँ ही मामला समाप्त है
() सबको नारायणका स्वरुप समझकर सेवा करे,इतनेमेँ ही कल्याण हो जायगा।
() गीताजीका एक ही श्लोक धारण कर ले,इतनेमेँ ही काम बन जायगा

*गीताका ग्यान,गोविँद का ध्यान गंगा का स्नान गौका दान गायत्रीका गान-ये पाँचो बहुत उत्तम हैँ सभी कल्याण करनेवाली है।

*गीता के अनुसार अपना जीवन बनाना चाहिए।

*गीताका प्रचार लोगोँमेँकरना चाहिए।भगवानकी भक्तिका प्रचार करना,लोगोँको भक्तिमार्गमेँ लगाना इससे बढ़कर कोई काम नहीँ है।

*गीता-प्रचारको सभी बातोँसे ऊँची समझकर भगवान कहते हैँ-
तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता मे तस्मादन्यः प्रियतरो भूवि॥(गीता 18.69)
उससे (गीता प्रचारकसे) बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योँमेँ कोई भी नहीँ है;तथा पृथ्वीभरमेँ उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्यमेँ होगा भी नहीँ।

*गीताका जो प्रचार करते हैँ तथा जो लोगोँको इसमेँ लगाते हैँ,उनसे बढ़कर संसारमेँ कोई भी नहीँ है।

*गीता-प्रचार करनेवाले लोगोँसे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीँ है।

*गीताकी पुस्तकको खूब आदर देना चाहिए।

*गीताको भगवान से भी बढ़कर बतावेँ तो भगवान नाराज नहीँ होँगे।

*गीतामेँ स्नान करनेवाला संसारका उद्धार कर सकता है,गीता गायत्रीसे भी बढ़कर है।


*गीता सुनते हुए मरनेवाला पाठ करनेवाला अर्थसहित पाठ करनेवाला अर्थ समझनेवाला धारण करनेवाला-ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैँ।

*गीता निष्पक्ष ग्रंथ है।वाममार्गकी भी गीता निँदा नहीँ करती।

*सारे शास्त्र दब जायँगे तो गीता जीती-जागती रह जायगी।

*गीताके प्रचारके लिए तो हमेँ सेनाकी तरह तैयार हो जाना चाहिए।

*मैँ गीता-गीता कहता रहता हूँ, कोई कहे कि पागल हो गये क्या?इस पागलपनमेँ भी मज *गीता का पाठ सुननेवाला भी मुक्त हो जाता है।

*गली-गलीमेँ गीता-ही-गीता हो जाय,ऐसा कोई भी घर बाकी नहीँ रहने दे जिस घर मेँ गीता हो।जिस घरमेँ गीता नहीँ, वह घर श्मशान के समान है।

*जिस घर मेँ गीता का पाठ नहीँ हो, वह यमपुरी के समान है।

*क्रिया, कण्ठ वाणी तथा हृदयमेँ गीता धारण करनी चाहिए।

*गीता कंठस्थ कर लेँ हृदय मेँ धारण कर ले गीता के सिद्धांत और उसके भाव एक हैँ।

*एक गीताके द्वारा हजारोँ-लाखोँ-करोड़ोँका कल्याण हो सकता है,इसकी बड़ी विलक्षणता है।

*गीतारुपी वृक्ष को सीँचो, यह संसारको काटता है।

*सबके हृदय कंठमेँ गीता बसा देवेँ।

*मेरा जीवन प्राण-सबकुछ गीता है।एक तरफ सब धन एक तरफ गीता होनेपर भी सांसारिक धनसे गीताकी तुलना नहीँ की जा सकती।

*गीता की स्तुति इस प्रकार गावेँ-
त्वमेव माता पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीता पोषण करती है इसलिए माता है गीता रक्षा करती है इसलिए पिता है।भाई तो धोखा दे सकता है गीता धोखा नहीँ देती। मौकेपर सखा भी साथ छोड़ देते हैँ,पर गीता नहीँ छोड़ती। यही असली विद्या है जिसके पास गीता धन है उसके पास सबकुछ है।

*गीता भगवानका हृदय वाणी श्वास आदेश सबकुछ है।

*हमारा सर्वस्व गीता है। सारा धन भले ही चला जाय गीता हमारे पास रह जाय।

*गीताजी मेँ एक-एक साधन की अंतिम सीमातक का साधन लिखा है।

*मेरे तो भगवद्गीता ही आधार है।

*परमात्माके नामका जप गीताके अभ्यास से प्रत्यक्ष लाभ होता है,इससे बढ़कर संसारमेँ कोई नहीँ है।सत्संग अच्छे पुरुषोँका संग इसकी जड़ है,परमात्माका ध्यान इसका फल है।

*प्रथम तो गीताका प्रचार अपनी आत्मामेँ करना चाहिए। पहले सिपाही बनकर कवायद सीखेँगे तभी तो कमांडर बनकर सिखायेँगे। आप जितनी मदद चाहेँ उतनी मिल सकती है। एक ही व्यक्ति स्वामी शंकराचार्यजीने कितना प्रचार किया,भगवान की शक्ति थी। *हरेक प्रकारसे गीताका प्रचार करना चाहिए।भगवानकी भक्तिके सभी अधिकारी हैँ।गीता बालक, स्त्री, वृद्ध, युवा-सभीके लिए है।

*सार यही है कि भगवानके कामके लिए कटिबद्ध होकर लग जाना चाहिए।स्वधर्मे निधनं श्रेयः अपने धर्म-पालनमेँ मरना भी पड़े तो कल्याण है। बंदरोँने भगवानका काम किया, उनमेँ क्या बुद्धि थी।गीताका प्रचार भगवानका ही काम है।निमित्त कोई भी बन जाय,भगवानकी शक्तिको मत भूलो 'तव प्रताप बल नाथ' मान-बड़ाई-प्रतिष्ठाके ठोकर मारकर काम करो,फिर देखो भगवान पीछे-पीछे फिरते हैँ,सारा काम स्वयं ही करते हैँ,तैयार होकर करो,डरो मत,विश्वास रखो।

*गीताका आदरपूर्वक पाठ करो। गीताका आदर आप करेँगे तो गीता आपका आदर करेगी।

*गीताके एक श्लोक और एक ही चरणको धारण कर ले तो उद्धार हो जानेपर सारी गीताको भी इसलिए याद करे कि भगवानका प्रिय बनना है, क्योँकि यह भगवानका सिद्धांत है, भगवान का हृदय है।गीताकी जितनी महिमा गायी जाय उतनी थोड़ी है।हमेँ जितना समय मिले उसमेँ लगावेँ और उसे हृदयमेँ धारण करके क्रियामेँ लायेँ।


*मरनेके समय गीताके श्लोकका उच्चारण करता हुआ मरे या भाव समझता हुआ मरे तो भी कल्याण हो जाता है।

*शास्त्रोँमेँ तो यहाँतक आया है कि मरते समय गीताकी पुस्तक मनुष्यके ऊपर मस्तकपर या सिरहाने रख दे तो भी कल्याण हो जाता है,फिर हृदयमेँ धारण करे तब तो बात ही क्या है?
*जैसे हनुमानजी महाराजने राम-नामको रोम-रोममेँ रमा लिया था,इसी तरह गीताको रोम-रोममेँ भरे,रोम-रोममेँ रमा लेवे।

*गीताका असली प्रचार तो यह है कि अपने आचरणसे वैसे करके दूसरेको प्रेमसे समझा दे।गीताकी एक भी बात किसीको पकड़ा दे तो यह गीताका असली प्रचार है।जीवन बना दे,अर्थको समझाकर तात्पर्य बतला दे धारण करा दे।

*गीताके श्लोक मंत्र हैँ।गीता मेँ एक एक बात तौल तौलकर रखी है,गीताको पाँचवाँ वेद भी मानो तो कोई अतिश्योक्ति नहीँ है। श्रधेय सेठ जी श्री जय दयाल जी गोयन्दका , गीता प्रेस , गोरखपुर ...(अमृत वचन)
http://www.facebook.com/Jaydayalji

भगवान की प्राप्ति २४ घंटे में हो सकती है

प्रवचन नंबर २४. (२८-१२-१९६३) गोबिंद भवन, कलकत्ता
भगवान की प्राप्ति २४ घंटे में हो सकती है| इसके लिए ५ चीज़ों का त्याग करना जरूरी है – आहार, जल, नींद, टट्टी और पेशाब एवं २ चीज़ों को ग्रहण करना जरूरी है – भगवन्नाम जप और भगवान का ध्यान|

श्रीराधा-माधव कृपा.....

"बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में एक महात्मा जी का निवास था जो युगल स्वरुप की उपासना किया करते थे.....एक बार वे महात्मा जी संध्या वन्दन के उपरान्त कुँजवन की राह पर जा रहे थे, मार्ग में महात्मा जी जब एक वटवृक्ष के निचे होकर निकले तो उनकी जटा उस वट-वृक्ष की जटाओं में उलझ गईं, बहुत प्रयास किया सुलझाने का परन्तु जब जटा नहीं सुलझी तो महात्मा भी तो महात्मा हैं वे आसन जमा कर बैठ गए की जिसने जटा उलझाई है वो सुलझाने आएगा तो ठीक है नही तो मैं ऐसे ही बैठा रहूँगा और बैठे- बैठे ही प्राण त्याग दूँगा......तीन दिन बीत गए महात्मा जी को बैठे हुए...एक सांवला सलोना ग्वालिया आया जो पाँच-सात वर्ष का रहा होगा...वो बालक ब्रजभाषा में बड़े दुलार से बोला "बाबा तुम्हारी तो जटा उलझ गईं, अरे मैं सुलझा दऊँ का".....और जैसे ही वो बालक जटा सुलझाने आगे बढ़ा महात्मा जी ने कहा "हाथ मत लगाना...पीछे हटो....कौन हो तुम" ग्वालिया : अरे हमारो जे ही गाम है महाराज गैया चरा रह्यो तो मैंने देखि महात्मा जी की जटा उलझ गईं है मैंने सोची ऐसो करूँ मैं जाए के सुलझा दऊँ..... महात्मा जी : न न न दूर हट जा ग्वालिया : चौं काह भयो..? महात्मा जी : जिसने जटा उलझाई है वो आएगा तो ठीक नहीं तो इधर ही बस गोविन्दाय नमो नमः  ग्वालिया : अरे महाराज तो जाने उलझाई है वाको नाम बताए देयो वाहे बुला लाऊँगो..... महात्मा जी : बोला न जिसने उलझाई है वो अपने आप आ जायेगा..तू जा नाम नहीं बताते हम...... कुछ देर तक वो बालक महात्मा जी को समझाता रहा परन्तु जब महात्मा जी नहीं माने तो उसी क्षण ग्वालिया के भेष को छुपा कर ग्वालिया में से साक्षात् मुरली बजाते हुए मुस्कुराते हुए भगवान बाँकेबिहारी प्रकट हो गए.......सांवरिया सरकार बोले "महात्मन मैंने जटा उलझाई है ? तो लो आ गया मैं"...और जैसे ही सांवरिया जी जटा सुलझाने आगे बढे..महात्मा जी ने कहा "हाथ मत लगाना....पीछे हटो....पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो ? महात्मा जी के वचन सुनकर सांवरिया जी सोच में पड़ गए, अरे कृष्ण भी दस-पाँच होते हैं क्या ? महात्मा जी फिर बोले "बताओ भी तुम कौन से कृष्ण हो....?" सांवरिया जी : कौन से कृष्ण हो मतलब ? महात्मा जी : देखो कृष्ण भी कई प्रकार के होते हैं, एक होते हैं देवकीनंदन कृष्ण, एक होते हैं यशोदानंदन कृष्ण, एक होते हैं द्वारकाधीश कृष्ण, एक होते हैं नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण.... सांवरिया जी : आपको कौन सा चाहिए....? महात्मा जी : मैं तो नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण का परमोपासक हूँ......  सांवरिया जी : वही तो मैं हूँ.......अब सुलझा दूँ....? और जैसे ही जटा सुलझाने सांवरिया सरकार आगे बढे तो महात्मा जी बोल उठे "हाथ मत लगाना...पीछे हटो....बड़े आये नित्य- निकुँजबिहारी कृष्ण....अरे नित्य- निकुँजबिहारी कृष्ण तो किशोरी जी के बिना मेरी स्वामिनी श्री राधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते और तुम तो अकेले सोटा से खड़े हो........" महात्मा जी के इतना कहते ही सांवरिया जी के कंधे पर श्रीजी का मुख दिखाई दिया, आकाश में बिजली सी चमकी और साक्षात् वृषभानु नंदिनी, वृन्दावनेश्वरी, रासेश्वरी श्री हरिदासेश्वरी स्वामिनी श्री राधिका जी अपने प्रीतम को गल-बहियाँ दिए महात्मा जी के समक्ष प्रकट हो गईं.....और बोलीं " बाबा मैं अलग हूँ क्या अरे मैं ही तो ये कृष्ण हूँ और ये कृष्ण ही तो राधा हैं, हम दोनों अलग थोड़े न है... हम दोनों एक हैं "..........अब तो युगल स्वरुप का दर्शन पाकर महात्मा जी आनंदविभोर हो उठे...उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी.....अब जैसे ही किशोरी राधा-कृष्ण जटा सुलझाने आगे बढे...महात्मा जी चरणों में गिर पड़े और बोले " अब जटा क्या सुलझाते हो युगल जी अब तो जीवन ही सुलझा दो.....मुझे नित्य लीला में प्रवेश देकर इस संसार से मुक्त करो दो".........महात्मा जी ने ऐसी प्रार्थना करी और प्रणाम करते-करते उनका शरीर शांत हो गया....स्वामिनी जी ने उनको नित्य लीला में स्थान प्रदान किया........ ये भाव राज्य की लीला है, भगवान श्रीराधा-माधव में कोई भेद नहीं है.....दोनों एक प्राण दो देह हैं.....जो मनुष्य अपनी अल्पज्ञतावश मूढ़तावश या अहंकारवश किशोरी राधा-कृष्ण दोनों में भेद समझते हैं वे संसार के घोर मायाजाल में गिर जाते हैं उनका पतन होना निश्चित है, वे भक्ति के परमपद को कभी प्राप्त नहीं करते........युगल चरणों में प्रेमभाव रखते हुए किशोरी राधा-कृष्ण एवं समस्त भक्तवृंद को दास का दंडवत प्रणाम....भगवान श्रीराधा-कृष्ण की कृपा सदैव हम सभी पर बरसती रहे.......
 

जय श्रीराधे !!

हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं !!  

॥ O' My Lord! May I never forget you ! ॥

चेष्टा भजन और सत्संग के लिये....

कोई मनुष्य बीमार है । वैद्य कहता है कि अमुक वस्तु आने से यह बच सकता है । ऐसे समय उस वस्तु के लिये कितनी अधिक चेष्टा होती है । ऐसी ही चेष्टा भजन और सत्संग के लिये होनी चाहिये । इच्छा के तीव्र होने से ही तीव्र चेष्टा होती है और तीव्र चेष्टा होने से ही इष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है । मिथ्या सांसारिक वस्तुएँ तो चेष्टा करने पर भी शायद नहीँ मिलती एवं मिल जानेपर भी रोगी को शायद लाभ पहुँचे अथवा न पहुँचे, परंतु भजन और सत्संग के लिये चेष्टा करने से तो अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है । भजन-सत्संगरुपी औषध का बहुत दिनोँ तक सेवन करने से जन्म-मरणरुपी कठिन भव-रोग अवश्य ही नष्ट हो जाता है । सत्य की चेष्टा कभी व्यर्थ नहीँ जाती ।
By:-  Jaydayalji Goyandka - Sethji