भक्त के लक्षण -१




 
भगवान को भक्तो का बड़ा महत्व है | वे जगत के लिए आदर्श होते है; क्योकि भगवद्भक्ति के प्रताप  से उनमे दुर्लभ दैवी गुण अनिवार्यरूप से प्रकट हो जाते है, जो उनके लिए स्वाभाविक लक्षण होते है | भक्त का स्वरुप जानने के लिये उन लक्षणों का जानना आवश्यक है | उनमे से कुछ ये है -

१.    भक्त अज्ञानी नहीं होता , वह भगवान के प्रभाव , गुण, रहस्य को तत्व से जानने वाला होता है | प्रेम के लिए ज्ञान की बड़ी आवश्यकता है | किसी न किसी अंश में जाने बिना उससे प्रेम नहीं हो सकता और प्रेम होने पर ही उसका गुह्तम यथार्थ रहस्य जाना जाता है | भक्त भगवान के गुह्तम रहस्य को जानता है, इसलिए भगवान के प्रति उसका प्रेम उतरोतर बढ़ता ही रहता है | भगवान रससार है | उपनिषद भगवान को ‘रसो वै स:’ कहते है | इस प्रेम में भी द्वैत  नहीं भासता ! प्रेम की प्रबलता से ही राधा जी कृष्ण बन जाती है और श्री कृष्ण राधा जी | कबीर साहब कहते है –  

जब में था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नायँ |
                                                   प्रेम-गली अति साँकरी, यामे दो न समायँ ||
 
वस्तुत: ज्ञानी और भक्त की स्तिथी में कोई अन्तर नहीं होता | भेद इतना ही है, ज्ञानी ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ कहता है और भक्त ‘वासुदेव: सर्वमिति’ अथवा गोसाइजी की भाषा में वह कहता है –

सिय राममय सब जग जानी | करहु  प्रनाम जोरि जग पानी ||

 
  भगवचर्चा,हनुमानप्रसाद पोद्दार,गीताप्रेस,गोरखपुर,कोड ८२०, पन्ना न० १९४

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप


        अथातो भक्तिं व्याख्यास्याम:l
      इस सूत्र के 'अथ' और 'अतः' शब्द से यह प्रतीत होता है कि भक्तिमार्ग के आचार्य परम भक्तशिरोमणि, सर्वभूतहित में रत,दयानिधि देवर्षि नारदजी अन्यान्य सिद्धान्तों  की व्याख्या तो कर चुके; अब जीवों के कल्याणार्थ परम कल्याणमयी  भक्ति के स्वरुप और साधनों की व्याख्या आरंभ करते हैं। नारदजी कहते हैं -
      सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा।। 
      भक्ति के अनेक प्रकार बतलाये गए हैं, परन्तु नारदजी जिस भक्ति की व्याख्या करते हैं वह प्रेम स्वरूपा  है। भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनों के आश्रय से रहित और सब ओर से स्पृहाशून्य  होकर चित्तवृति अनन्य भाव से जब केवल भगवान् में ही लग जाती है; जगत के समस्त पदार्थों से तथा परलोक की समस्त सुख-सामग्रियों से, यहाँ तक कि मोक्ष-सुख से भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान् में लगा रहता है, सारी  ममता और आसक्ति सब पदार्थों से सर्वथा निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान् के प्रति हो जाती है, तब उस स्थिति को 'अनन्य प्रेम' कहते हैं।
       अमृतस्वरूपा च।।
       भगवान् में अनन्य प्रेम ही वास्तव में अमृत है; वह सबसे अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे पानकर  अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य प्रेमी भक्त के ह्रदय में भगवत्प्रेम की एक नित्य नवीन, पवित्र वासना के अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ वासना के कारण  वह भगवान् की मुनिमनहारिणी लीला का  साधन बनकर कर्मबन्धन युक्त जन्म-मृत्यु के चक्कर से सर्वथा छूट जाता है। वह सदा भगवान् के समीप निवास करता है और भगवान् उसके समीप।प्रेमी भक्त और प्रेमास्पद भगवान् का यह नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसी से भक्तजन मुक्ति न चाहकर भक्ति चाहते हैं।

प्रेम-दर्शन [341] 

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप


अब आगे .........
अस बिचारि  हरि  भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति  लुभाने।।
         जिसने भगवत-प्रेमामृत पान  कर लिया, वही सिद्ध है। 'सिद्ध' शब्द से यहाँ अणिमादि  सिद्धियों से अभिप्राय नहीं है। प्रेमी भक्त, इन सिद्धियों की तो बात ही क्या, मोक्षरूप सिद्धि भी नहीं चाहता।ये सिद्धियाँ तो ऐसे प्रेमी भक्त की सेवा के लिए अवसर ढूँढा करती है, परन्तु वह भगवत्प्रेम के सामने अत्यन्त  तुच्छ समझकर इनको स्वीकार ही नहीं करता। स्वयं भगवान् कहते हैं -
         'मुझ में चित्त लगाये रखनेवाले मेरे प्रेमी भक्त मुखको छोड़कर ब्रह्मा का पद, इन्द्रासन, चक्रवर्ती राज्य, लोकंतारोका आधिपत्य, योग की सब सिद्धियाँ और सायुज्य मोक्ष आदि कुछ भी नहीं चाहते।' एक भक्त कहते हैं -
         'प्रियतम श्रीकृष्ण की पूजा करते समय शरीर पुलकित हो गया, भक्ति से मन प्रफुल्लित हो गया। प्रेम के आंसुओं ने मुख को और गदगद वाणी ने कंठ को सुशोभित कर दिया। अब तो हमें एक क्षण के लिये भी फुर्सत नहीं है कि हम किसी दूसरे  विषय को स्वीकार करें। इतने पर भी सायुज्य आदि चारों प्रकार की मुक्तियाँ न जाने क्यों हमारे दरवाजे पर खड़ी  हमारी दासी बनने के लिए आतुर हो रही हैं।'
          भक्त यदि भुक्ति और मुक्ति को स्वीकार कर ले तो वे अपना परम सौभाग्य मानती हैं, परन्तु भक्त ऐसा नहीं करते। 'मुक्ति आदि सिद्धियाँ और अनेक प्रकार की विलक्षण भुक्तियाँ ( भोग ) दासी की भांति हरिभक्ति महादेवी की सेवा में लगी रहती हैं।'

प्रेम-दर्शन [341]

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप



        काकभुशुन्डी जी महाराज कहते हैं -
        जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई l
                             कोटि   भाँति   कोऊ   करे  उपाई।
        तथा   मोच्छ   सुख   सुनु   खगराई।      
                             रहि न सकई हरि भगति  बिहाई।।

        इसीलिये यहाँ सिद्धि का अर्थ 'कृतकृत्यता' लेना चाहिये। भक्त को किसी वस्तु के अभाव का बोध नहीं रहता। वह प्रियतम भगवान् के प्रेम को पाकर सर्वथा पूर्णकाम हो जाता है। यह पूर्णकामता ही उसका अमर होंना है। जब तक मनुष्य कृतकृत्य या पूर्णकाम नहीं होता, तब तक उसे बारम्बार कर्मवश आना-जाना पड़ता है। पूर्णकाम भक्त सृष्टि और संहार दोनों में भगवान् की लीला का प्रत्यक्ष अनुभव कर मृत्यु को खेल समझता है। वास्तव में उसके लिए मृत्यु की ही मृत्यु हो जाती है। प्रभु-लीला के सिवा मृत्युसंज्ञक,कोई भयावनी वस्तु उसके ज्ञान में रह ही नहीं जाती और इसलिये वह तृप्त हो जाता है। जबतक जगत के पदार्थों की ईश्वर-लीला से अलग कोई सत्ता रहती है तभी तक उनको सुखद या दुःख प्रद समझकर मनुष्य निरन्तर  नये-नये सुखप्रद पदार्थों की इच्छा करता हुआ अतृप्त रहता है। जब सबका मूल  स्रोत सबका यथार्थ पूर्ण स्वरुप उसे मिल जाता है तब उन खण्ड और अपूर्ण पदार्थों की ओर उसका मन ही नहीं जाता। वह पूर्ण को पाकर तृप्त हो जाता है।

प्रेम-दर्शन [341]