प्रेम-दर्शन


     वह (प्रेमाभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोध-स्वरूपा है।
      यह प्रेमाभक्ति सर्वथा त्यागरूप है। इसमें धन, संतान, कीर्ति, स्वर्ग आदि की तो बात ही क्या, मोक्ष की भी कामना नहीं रह सकती। जिस भक्ति के बदले में कुछ माँगा जाता है या कुछ प्राप्त होने की आशा या आकांक्षा है, वह भक्ति कामनायुक्त है, वह स्वार्थ का व्यापार है। प्रेमाभक्ति में तो भक्त अपने प्रियतम भगवान् और उनकी सेवा को छोड़कर और कुछ चाहता ही नहीं। श्रीमद्भागवत भगवान् कपिलदेव कहते हैं कि 'मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवा छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारुप्य और सायुज्य ( इन पाँच प्रकार की ) मुक्तियों को देने पर भी नहीं लेते।' यथार्थ भक्ति के उदय होने पर कामनाएँ नष्ट हो ही जाती हैं। क्योंकि वह भक्ति निरोधरुपा  यानी त्यागमयी है। वह निरोध क्या है ?
      लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।
      प्रेम-भक्ति में यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेम में मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान् को छोड़कर अन्य किसी बात को जानता  नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता है, उसकी आँखों के सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान् की छबि ही रहती है। दूसरी वस्तु में उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियों ने भगवान् से कहा था -
      'हे प्रियतम ! हमारा चित्त आनन्द से घर के कामों में आसक्त हो रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घर के कामों में लगे थे, वे भी चेष्टाहीन हो गए और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद-पद्मों को छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर कैसे जायें और जाकर करें भी क्या ?'
      जगत का चित्र चित्त से मिट जाने के कारण  वह भक्त किसी भी लौकिक ( स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्य के करने लायक नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते है।
      उस प्रियतम भगवान् में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय से उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।
      बाहरी ज्ञान बना रहने की स्थिति में भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतम के प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्यों से सर्वथा उदासीन रहता है। इस प्रकार सावधानी से होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते हैं। प्रेमी भक्त के द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतम के अनुकूल होती है और अनन्य भाव से उसी की सेवा के लिए होती है। प्रतिकूल चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्य के द्वारा कहीं अँधेरा नहीं होता या अमृत के द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती।

प्रेम-दर्शन [341]

प्रेम-दर्शन


प्रेम में अनन्यता

   (अपने प्रियतम भगवान् को छोड़कर) दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।
         प्रेमी भक्त के मन में अपने प्रियतम भगवान् के सिवा अन्य किसी के होने की ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरे  का भजन कैसे करे ? वह तो चराचर विश्व को अपने प्रियतम का शरीर जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं -
   उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं।।
         रहीम कहते हैं कि आँखों में प्यारे की मधुर छबि ऐसी समां रही है कि दूसरी किसी छबि के लिये स्थान ही नहीं रह गया - यदि कोई उससे दूसरे की बात कहता है तो वह उसे सुनना ही नहीं चाहता या उसे सुनायी  ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती सुननी  पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं।शिवजी की अनन्योपासिका पार्वती जी को सप्तर्षियों ने महादेवजी के अनेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसदगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु में मन लगाने को कहा, तब शिवप्रेम की मूर्ति भगवती ने उत्तर दिया -
    
  जन्म कोटि लगि रगर हमारी। ब़रऊँ संभु न त रहऊँ कुआरी।।

महादेव अवगुन  भवन  बिष्णु  सकल गुन  धाम।
जेहि कर मनु राम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।
       
     इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान् को ही जानकर, उसी को सर्वस्व मानकर, जैसे मछली को केवल जल की आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान् का ही आश्रय लेकर सारी  चेष्टाएँ उसीके लिये करता है।

प्रेम-दर्शन [341]
          

निरन्तर नामस्मरण

॥श्रीहरि:॥

निरन्तर भगवान् का नामस्मरण होता रहे l इस से बढ़कर और क्या करना है l निरन्तर नामस्मरण ही भगवान् का सानिध्य प्राप्त कराने में पूर्ण समर्थ है l पाँच बातों का ख्याल रखिये - १- पापकर्म (कम-से-कम शरीर से तो न हो) l २- व्यर्थ चर्चा न हो l ३- किसी के साथ बुरा बर्ताव न हो l ४- भगवान् के नाम की विशेष चेष्टा रहे l ५- भगवत्कृपा पर विश्वास हो l आप विष्णु भगवान् की उपासना करते हैं सो बहुत उत्तम है l ध्यान के लिए समय कम मिलता है, जो कुछ कभी मिलता है - वह दूसरे-दूसरे चिन्तन में बीत जाता है, लिखा सो ठीक है l नामस्मरण यदि होता रहे तो वह ध्यान ही है l पाप न हो, विषय चिन्तन न हो, आलस्य प्रमाद में समय न बीते, संसार का मोह न हो, एकमात्र भगवद चिन्तन में लगे हुए ही सब काम हो - आपकी यह सभी कामनाएं बहुत ही सराहनीय तथा अत्यंत उत्तम हैं l परन्तु मेरे कुछ लिख देने से ही पूरी हो जाएँगी, ऐसी बात नहीं है l आप इन की आवश्यकता का पूरा अनुभव करेंगे और भगवत्कृपा पर विश्वास करके अध्यवसाय में लग जायेंगे तब भगवत्कृपा से ही ये पूरी होंगी l इस के लिए आप श्री भगवान् से प्रार्थना कीजिये l

पदरत्नाकर

पदरत्नाकर



॥श्रीहरि:॥

८३
प्रभु ! तुम अपनौ बिरद सँभारौ।
हौं अति पतित, कुकर्मनिरत, मुख मधु, मन कौ बहु कारौ॥
तृस्ना-बिकल, कृपन, अति पीडित, काम-ताप सौं जारौ।
तदपि न छुटत विषय-सुख-‌आसा, करि प्रयत्न हौं हारौ॥
अब तौ निपट निरासा छा‌ई, रह्यौ न आन सहारौ।
एक भरोसौ तव करुना कौ, मारौ चाहें तारौ॥

८४
प्रभु ! मोहि दे‌उ साँचौ प्रेम।
भजौं केवल तुमहि, तजि पाखंड, झूँठे नेम॥
जरै बिषय-कुबासना, मन जगै सहज बिराग।
होय परम अनन्य तुहरे पद-कमल-‌अनुराग॥
परम श्रद्धेय नित्यलीलालीन श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार भाईजी , पदरत्नाकर कोड- 50, गीता प्रेस , गोरखपुर