सन्त हृदयोद्गार


सन्त हृदयोद्गार

1.    अगर आप भगवान को मानते हैं, तो उस मान्यता का परिचय हमारे आपके जीवन से हो, केवल विचारों से नहीं । हमारा जीवन बता दे कि हम भगवान को मानते हैं ।

2.    बहुत से लोग हैं जो प्रभु को मानते हैं । बहुत से लोग हैं जो संसार की वास्तविकता को जानते हैं । महत्व की बात यह है कि उस जाने हुए का प्रभाव कितना है जीवन में; उस माने हुए का प्रभाव कितना है जीवन में ।

3.     भगवान का स्मरण करने से जीव का कल्याण होता है - यह बात भी हम अच्छी तरह जानते हैं, फिर भी मन भगवान में नहीं लगता, तो इससे बढ़कर और नास्तिकता क्या होगी ?

4.    वस्तुविशेष में भगवद्बुद्धि होना कोई कठिन बात नहीं है । पर यह अधूरी आस्तिकता है । पूरी आस्तिकता का तो अर्थ यह है कि भगवान से भिन्न कुछ है ही नहीं । अभी भी नहीं है, पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं होगा ।

5.    गहराई से देखिए, किसी का होना कुछ अर्थ नहीं रखता, जबतक कि उससे अपना सम्बन्ध न हो, और किसी से भी सम्बन्ध उस समय तक नहीं होता, जबतक कि उसकी आवश्यकता न हो ।   

6.    अगर आपको उनके (संसार के रचयिता के) बिना अनुकूलता प्रिय है, तो वह उसी प्रकार की है कि एक सुन्दर कमरा सजा है और आप दोस्त के बिना हैं; एक सुन्दर स्त्री श्रृंगार करे और पति से वंचित रहे, या शरीर आत्मा-रहित हो । आस्तिकवाद का न होना जीवन में अकेले पड़े रहने के समान है।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

भगवान् कि कृपा सबकी सम्पत्ति है




जो जितना दीन है, उसमें भगवान् की कृपाशक्तिका उतना ही अधिक प्रकाश है! 'दैन्य' भगवान् की कृपाके प्राकट्यके बीच लगे पर्देको फाड़ डालता है! 


जैसे ब्रम्हाजीकी वाणी एक  'द' तीन अर्थ रखती है, वैसे ही गीता भगवान् श्री कृष्णकी वाणी है! उसके अनेक अर्थ अधिकारी-भेद से  होते हैं! यही हेतु है कि विभिन्न आचार्यों, टीकाकारोंने गीताके अर्थ पृथक् -पृथक् किये हैं! अधिकारी-भेदसे उन सब अर्थोंका सामंजस्य है! 


भगवान् की कृपा अधिकारी-भेद्की अपेक्षा नहीं  रखती! वह केवल देखती है की यह एकमात्र कृपाका आकांक्षी है कि नहीं! 


भगवान् कि कृपा सबकी सम्पत्ति है, पर दोनोंकी सम्पत्ति विशेषरूपसे है; क्योंकि भगवान् 'दीनवत्सल' हैं!


अबोध बालक, जो बोलना नहीं जनता, किसी प्रकारका संकेत करना नहीं जानता, वह रोकर ही मनोव्यथा व्यक्त करता है! इसी प्रकार जिसके पास रोनेके सिवा कोई साधन नहीं, वह भगवान् के सामने कातर होकर रोये! जगतके सामने रोना अशुभ है, कायरता हैं; भगवान् के सामने रोना परम मंगलकारी है एवं परम बलका घोतक है! 


भगवान् की  कृपापर  भरोसा करके दीनभावसे भगवान् के शरणापन्न हो जाना चाहिये! जब हम भगवान् के शरणापन्न हो जाते हैं और भगवान् पास आ जाते हैं, तब उनके दैवी गुण स्वतः हममें आविर्भूत होते हैं! फिर बंधनोंको काटना नहीं पड़ता, बंधन अकुलाकर स्वतः छिन्न हो जाते हैं; ग्रन्थि खोलनी नहीं पड़ती, वह स्वतः खुल जाती है! 


हम कैसे भी हों, भगवान् की कृपा ऐसी विलक्षण है कि वह हमें सब प्रकारके दोषों- पापोंसे मुक्त करके भगवान् के चरणोंका आश्रय प्रदान कर देती है! अन्यथा दीन-हीनोंका काम कैसे बनता! 





भाईजी की अतुल संपत्ति

जीवन में उतारने योग्य भाईजी की अतुल संपत्ति— १.सबमें भगवान् को देखना २.भगवत्कृपा पर अटूट विश्वास ३.भगवन्नाम का अनन्य आश्रय करो प्रभु ! ऐसी दृष्टि-प्रदान। देख सकूँ सर्वत्र तुम्हारी सतत मधुर मुस्कान ॥ हो चाहे परिवर्तन कैसा भी-अति क्षुद्र, महान। सुन्दर-भीषण, लाभ-हानि, सुख-दुःख, मान-अपमान॥ प्रिय-अप्रिय,स्वस्थता-रुग्णता, जीवन-मरण-विधान। सभी प्राकृतिक भोगोंमें हो भरे तुम्ही भगवान् ॥ हो न उदय उद्वेग-हर्ष कुछ,कभी दैन्य-अभिमान। पाता रहूँ तुम्हारा नित संस्पर्श बिना-उपमान॥ - पूज्य भाई जी (पदरत्नाकर) हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ||

सद्गुरू


|| श्री हरि: ||




गुरुर्ब्रह्मा गुरुविष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः |

गुरु: साक्षातपरम्  ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ||


भारतीय साधना में गुरु-शरणागति सर्वप्रथम हैं | सद्गुरु की कृपा बिना साधना का यथार्थ रहस्य समझ में नहीं आ सकता |केवल शास्त्रों और तर्कों से लक्ष्य तक नहीं पंहुचा जा सकता | अनुभवी सद्गुरु साधनपथ के अन्तराय, उससे बचने के उपाय और साधन मार्ग का उपादेय पाथेय बतलाकर शिष्य को लक्ष्य तक अनायास ही पहुँचा देते है | इसलिये श्रुतियो से लेकर वर्तमान समय के संतो की वाणी तक सभी में एक स्वर से सद्गुरु की शरण में उपस्थित होकर अपने अधिकार के अनुसार उनसे उपदेश प्राप्त कर तदनुकूल आचरण करने का आदेश दिया है | सभी संतो ने मुक्तकंठ से गुरु महिमा का गान किया है | यहाँ तक की गुरु और गोविन्द  दोनों के एक साथ मिलने पर पहले गुरु को ही प्रणाम करने की विधि बतलाई गयी है; क्योकि गुरु कृपा से ही गोविन्द के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है | गुरु की महिमा अवर्णनीय है | वे पुरुष धन्य हैं - बड़े ही सौभाग्यवान है जिन्हें सद्गुरु मिले और जिन्होंने अपना जीवन उनके आज्ञा पालन के लिए सहर्ष उत्सर्ग कर दिया |

वास्तव में यथार्थ पारमार्थिक साधन सद्गुरु की सन्निधि में ही संभव हैं | कृपालु गुरु के कर्णधार हुए बिना साधन-तरणी का विषय-समुद्र की नभोव्यापिनी उत्ताल-तरंगो से बच कर उस पार तक पहुच जाना नितान्त असम्भव है | इसलिये प्रत्येक साधक को सद्गुरु की खोज करनी चाहिये और ईश्वर से आर्तभाव से प्रार्थना करनी चाहिये की जिसमे इश्वरानुग्रह से सद्गुरु की प्राप्ति हो जाये; क्योकि वास्तविक संत-महात्मा भगवत्कृपा से ही प्राप्त होते है |

शेष अगले ब्लॉग में ...

नारायण नारायण नारायण.. नारायण नारायण नारायण... नारायण नारायण नारायण....

नित्यलीलालीन श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार, भगवत्चर्चा, पुस्तक कोड  ८२० गीताप्रेस, गोरखपुर

भक्त के लक्षण -१




 
भगवान को भक्तो का बड़ा महत्व है | वे जगत के लिए आदर्श होते है; क्योकि भगवद्भक्ति के प्रताप  से उनमे दुर्लभ दैवी गुण अनिवार्यरूप से प्रकट हो जाते है, जो उनके लिए स्वाभाविक लक्षण होते है | भक्त का स्वरुप जानने के लिये उन लक्षणों का जानना आवश्यक है | उनमे से कुछ ये है -

१.    भक्त अज्ञानी नहीं होता , वह भगवान के प्रभाव , गुण, रहस्य को तत्व से जानने वाला होता है | प्रेम के लिए ज्ञान की बड़ी आवश्यकता है | किसी न किसी अंश में जाने बिना उससे प्रेम नहीं हो सकता और प्रेम होने पर ही उसका गुह्तम यथार्थ रहस्य जाना जाता है | भक्त भगवान के गुह्तम रहस्य को जानता है, इसलिए भगवान के प्रति उसका प्रेम उतरोतर बढ़ता ही रहता है | भगवान रससार है | उपनिषद भगवान को ‘रसो वै स:’ कहते है | इस प्रेम में भी द्वैत  नहीं भासता ! प्रेम की प्रबलता से ही राधा जी कृष्ण बन जाती है और श्री कृष्ण राधा जी | कबीर साहब कहते है –  

जब में था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नायँ |
                                                   प्रेम-गली अति साँकरी, यामे दो न समायँ ||
 
वस्तुत: ज्ञानी और भक्त की स्तिथी में कोई अन्तर नहीं होता | भेद इतना ही है, ज्ञानी ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ कहता है और भक्त ‘वासुदेव: सर्वमिति’ अथवा गोसाइजी की भाषा में वह कहता है –

सिय राममय सब जग जानी | करहु  प्रनाम जोरि जग पानी ||

 
  भगवचर्चा,हनुमानप्रसाद पोद्दार,गीताप्रेस,गोरखपुर,कोड ८२०, पन्ना न० १९४

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप


        अथातो भक्तिं व्याख्यास्याम:l
      इस सूत्र के 'अथ' और 'अतः' शब्द से यह प्रतीत होता है कि भक्तिमार्ग के आचार्य परम भक्तशिरोमणि, सर्वभूतहित में रत,दयानिधि देवर्षि नारदजी अन्यान्य सिद्धान्तों  की व्याख्या तो कर चुके; अब जीवों के कल्याणार्थ परम कल्याणमयी  भक्ति के स्वरुप और साधनों की व्याख्या आरंभ करते हैं। नारदजी कहते हैं -
      सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा।। 
      भक्ति के अनेक प्रकार बतलाये गए हैं, परन्तु नारदजी जिस भक्ति की व्याख्या करते हैं वह प्रेम स्वरूपा  है। भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनों के आश्रय से रहित और सब ओर से स्पृहाशून्य  होकर चित्तवृति अनन्य भाव से जब केवल भगवान् में ही लग जाती है; जगत के समस्त पदार्थों से तथा परलोक की समस्त सुख-सामग्रियों से, यहाँ तक कि मोक्ष-सुख से भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान् में लगा रहता है, सारी  ममता और आसक्ति सब पदार्थों से सर्वथा निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान् के प्रति हो जाती है, तब उस स्थिति को 'अनन्य प्रेम' कहते हैं।
       अमृतस्वरूपा च।।
       भगवान् में अनन्य प्रेम ही वास्तव में अमृत है; वह सबसे अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे पानकर  अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य प्रेमी भक्त के ह्रदय में भगवत्प्रेम की एक नित्य नवीन, पवित्र वासना के अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ वासना के कारण  वह भगवान् की मुनिमनहारिणी लीला का  साधन बनकर कर्मबन्धन युक्त जन्म-मृत्यु के चक्कर से सर्वथा छूट जाता है। वह सदा भगवान् के समीप निवास करता है और भगवान् उसके समीप।प्रेमी भक्त और प्रेमास्पद भगवान् का यह नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसी से भक्तजन मुक्ति न चाहकर भक्ति चाहते हैं।

प्रेम-दर्शन [341] 

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप


अब आगे .........
अस बिचारि  हरि  भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति  लुभाने।।
         जिसने भगवत-प्रेमामृत पान  कर लिया, वही सिद्ध है। 'सिद्ध' शब्द से यहाँ अणिमादि  सिद्धियों से अभिप्राय नहीं है। प्रेमी भक्त, इन सिद्धियों की तो बात ही क्या, मोक्षरूप सिद्धि भी नहीं चाहता।ये सिद्धियाँ तो ऐसे प्रेमी भक्त की सेवा के लिए अवसर ढूँढा करती है, परन्तु वह भगवत्प्रेम के सामने अत्यन्त  तुच्छ समझकर इनको स्वीकार ही नहीं करता। स्वयं भगवान् कहते हैं -
         'मुझ में चित्त लगाये रखनेवाले मेरे प्रेमी भक्त मुखको छोड़कर ब्रह्मा का पद, इन्द्रासन, चक्रवर्ती राज्य, लोकंतारोका आधिपत्य, योग की सब सिद्धियाँ और सायुज्य मोक्ष आदि कुछ भी नहीं चाहते।' एक भक्त कहते हैं -
         'प्रियतम श्रीकृष्ण की पूजा करते समय शरीर पुलकित हो गया, भक्ति से मन प्रफुल्लित हो गया। प्रेम के आंसुओं ने मुख को और गदगद वाणी ने कंठ को सुशोभित कर दिया। अब तो हमें एक क्षण के लिये भी फुर्सत नहीं है कि हम किसी दूसरे  विषय को स्वीकार करें। इतने पर भी सायुज्य आदि चारों प्रकार की मुक्तियाँ न जाने क्यों हमारे दरवाजे पर खड़ी  हमारी दासी बनने के लिए आतुर हो रही हैं।'
          भक्त यदि भुक्ति और मुक्ति को स्वीकार कर ले तो वे अपना परम सौभाग्य मानती हैं, परन्तु भक्त ऐसा नहीं करते। 'मुक्ति आदि सिद्धियाँ और अनेक प्रकार की विलक्षण भुक्तियाँ ( भोग ) दासी की भांति हरिभक्ति महादेवी की सेवा में लगी रहती हैं।'

प्रेम-दर्शन [341]

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप



        काकभुशुन्डी जी महाराज कहते हैं -
        जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई l
                             कोटि   भाँति   कोऊ   करे  उपाई।
        तथा   मोच्छ   सुख   सुनु   खगराई।      
                             रहि न सकई हरि भगति  बिहाई।।

        इसीलिये यहाँ सिद्धि का अर्थ 'कृतकृत्यता' लेना चाहिये। भक्त को किसी वस्तु के अभाव का बोध नहीं रहता। वह प्रियतम भगवान् के प्रेम को पाकर सर्वथा पूर्णकाम हो जाता है। यह पूर्णकामता ही उसका अमर होंना है। जब तक मनुष्य कृतकृत्य या पूर्णकाम नहीं होता, तब तक उसे बारम्बार कर्मवश आना-जाना पड़ता है। पूर्णकाम भक्त सृष्टि और संहार दोनों में भगवान् की लीला का प्रत्यक्ष अनुभव कर मृत्यु को खेल समझता है। वास्तव में उसके लिए मृत्यु की ही मृत्यु हो जाती है। प्रभु-लीला के सिवा मृत्युसंज्ञक,कोई भयावनी वस्तु उसके ज्ञान में रह ही नहीं जाती और इसलिये वह तृप्त हो जाता है। जबतक जगत के पदार्थों की ईश्वर-लीला से अलग कोई सत्ता रहती है तभी तक उनको सुखद या दुःख प्रद समझकर मनुष्य निरन्तर  नये-नये सुखप्रद पदार्थों की इच्छा करता हुआ अतृप्त रहता है। जब सबका मूल  स्रोत सबका यथार्थ पूर्ण स्वरुप उसे मिल जाता है तब उन खण्ड और अपूर्ण पदार्थों की ओर उसका मन ही नहीं जाता। वह पूर्ण को पाकर तृप्त हो जाता है।

प्रेम-दर्शन [341]  

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप



        वह प्रेमी भक्त उस परम महान वस्तु को पा लेता है, जिसके पाने पर सारी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। जगत के प्रेम, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, बल, यश, ज्ञान, वैराग्य आदि समस्त पदार्थ, जिनके लिये भोगी और त्यागी सभी मनुष्य अपनी-अपनी रूचि के अनुसार सदा ललचाते रहते हैं, भगवत्प्रेमरूपी दुर्लभ पदार्थ के सामने अत्यन्त तुच्छ हैं। विश्वभर में फैले हुए उपर्युक्त समस्त पदार्थों को एक स्थान पर एकत्रित किया जाये तो भी वे सब मिलकर जिस भगवान् रूपी समुद्र के एक जलकण के समान ही होते हैं, वे भगवान् स्वयं जिस प्रेम के आकर्षण से सदा खिंचे  रहते हैं, उस प्रेम के सामने संसार के पदार्थ किस गिनती में हैं ?
        श्री शुकदेव मुनि कहते हैं - 'जो परम कल्याण के स्वामी भगवान् श्रीहरि की भक्ति करता है वह अमृत के समुद्र में क्रीडा करता है। गढ़ैया में भरे हुए मामूली गंदे जल के सदृश किसी भी भोग या स्वर्गादि में उसका मन चलायमान नहीं होता।'
        प्रेमामृत समुद्र में डूबा हुआ भक्त क्यों अन्य पदार्थों की इच्छा करने लगा ? जैसे भक्त भोग, मोक्ष आदि की इच्छा नहीं करता,वैसे ही  नष्ट हो जाने का शोक भी नहीं करता। भोगों के नाश को वह परमात्मा की लीला समझता है, इससे सदा - हर हालत में आनन्द  में ही रहता है। परन्तु भगवत्प्रेम के सेवन में यदि सायुज्य मोक्ष के साधन में कमी आती है तो वह उसके लिये भी शोक नहीं करता; वरं सदा यही चाहता है कि मेरा भगवत्प्रेम बढ़ता रहे, चाहे जन्म कितने ही क्यों न धारण करने पड़ें।
        इसी प्रकार वह किसी जीव से या लौकिक दृष्टि से प्रतिकूल माने जानेवाले पदार्थ या स्थिति से कभी द्वेष नहीं करता। वह सब जीवों में अपने प्रभु को और सब पदार्थों और स्थिति में प्रभु की लीला को देख-देखकर क्षण-क्षण में आनन्दित होता है।
        भक्त का मन सदा प्रभु-प्रेम में ऐसा तल्लीन हो ज जाता है कि आधे क्षणभर के लिये भी अन्य किसी पदार्थ में नहीं रमता। गोपियाँ उद्धवजी से कहती हैं -
                        उधो,   मन   न   भए  दस   बीस ।
               एक हुतो सो गयो स्याम सँग, को आराधै ईस।।

        मन अपने पास रहता ही नहीं, तब वह दूसरे में कैसे रमे ? इसीलिये तो प्रेमियों के भगवान् का नाम 'मनचोर' है।


प्रेम-दर्शन [341]

प्रेमरुपा भक्ति का स्वरुप


अब आगे .........
                            मधुकर स्याम हमारे चोर।   
         मन हर लियो माधुरी मूरति, निरख नयन की कोर।।

       वे प्रेमी भक्त के चित्त को ऐसी चातुरी से चुराकर अपनी सम्पत्ति बना लेते हैं कि उस पर दूसरे की कभी नज़र भी नहीं पड़ सकती। दूसरा कोई दीखे तब न कहीं उसमें आसक्ति या प्रीति  हो, परन्तु जहाँ मन में दूसरे  की कल्पना तक को स्थान नहीं मिलता, वहाँ  किस में कैसे आसक्ति या रति हो। प्रेममयी गोपियों ने कहा है -
        स्याम  तन  स्याम मन  स्याम है  हमारो  धन,
                    आठों जैम  ऊधौ हमें  स्याम ही सों काम है।।  
       स्याम हिये स्याम जिये स्याम बिनु नाहिं लिये,
                    आन्धे की सी लाकरी अधार स्याम नाम है।।
       स्याम गति  स्याम मति स्याम ही है प्रानपति,
                    स्याम  सुखदाई  सों  भलाई  सोभाधाम  है।।
       ऊधौ  तुम  भए   बौरे  पाती   लैके   आए   दौरे,
                    जोग  कहाँ  राखैं यहाँ  रोम-रोम  स्याम है।।

       जब एक प्रियतम श्रीकृष्ण को छोड़कर दूसरे  का मन में प्रवेश ही निषिद्ध है तब दूसरे किसी की प्राप्ति के लिये उत्साह तो हो ही कैसे ? कोई किसी को देखे, सुने, उसके लिये  मन में इच्छा उत्पन्न हो, तब न उसके लिये  प्रयत्न किया जाए ? मन किसी में रमे, तब न उसे पाने के लिये उत्साह हो। मन तो पहले से ही किसी एक का हो गया;उसने मन पर पूरा अधिकार जमा लिया और स्वयं उसमें आकर सदा के लिये बस गया। दूसरे  किसी के लिये  कोई गुंजाइश ही नहीं रह गयी; यदि कोई आता भी है तो उसे दूर से ही लौट जाना पड़ता है। क्या करे, जगह ही नहीं रही।
    
प्रेम-दर्शन [341]
              

प्रेम-दर्शन


     वह (प्रेमाभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोध-स्वरूपा है।
      यह प्रेमाभक्ति सर्वथा त्यागरूप है। इसमें धन, संतान, कीर्ति, स्वर्ग आदि की तो बात ही क्या, मोक्ष की भी कामना नहीं रह सकती। जिस भक्ति के बदले में कुछ माँगा जाता है या कुछ प्राप्त होने की आशा या आकांक्षा है, वह भक्ति कामनायुक्त है, वह स्वार्थ का व्यापार है। प्रेमाभक्ति में तो भक्त अपने प्रियतम भगवान् और उनकी सेवा को छोड़कर और कुछ चाहता ही नहीं। श्रीमद्भागवत भगवान् कपिलदेव कहते हैं कि 'मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवा छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारुप्य और सायुज्य ( इन पाँच प्रकार की ) मुक्तियों को देने पर भी नहीं लेते।' यथार्थ भक्ति के उदय होने पर कामनाएँ नष्ट हो ही जाती हैं। क्योंकि वह भक्ति निरोधरुपा  यानी त्यागमयी है। वह निरोध क्या है ?
      लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मों के त्याग को निरोध कहते हैं।
      प्रेम-भक्ति में यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेम में मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान् को छोड़कर अन्य किसी बात को जानता  नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता है, उसकी आँखों के सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान् की छबि ही रहती है। दूसरी वस्तु में उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियों ने भगवान् से कहा था -
      'हे प्रियतम ! हमारा चित्त आनन्द से घर के कामों में आसक्त हो रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घर के कामों में लगे थे, वे भी चेष्टाहीन हो गए और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद-पद्मों को छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर कैसे जायें और जाकर करें भी क्या ?'
      जगत का चित्र चित्त से मिट जाने के कारण  वह भक्त किसी भी लौकिक ( स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्य के करने लायक नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते है।
      उस प्रियतम भगवान् में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय से उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।
      बाहरी ज्ञान बना रहने की स्थिति में भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतम के प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्यों से सर्वथा उदासीन रहता है। इस प्रकार सावधानी से होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते हैं। प्रेमी भक्त के द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतम के अनुकूल होती है और अनन्य भाव से उसी की सेवा के लिए होती है। प्रतिकूल चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्य के द्वारा कहीं अँधेरा नहीं होता या अमृत के द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती।

प्रेम-दर्शन [341]

प्रेम-दर्शन


प्रेम में अनन्यता

   (अपने प्रियतम भगवान् को छोड़कर) दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।
         प्रेमी भक्त के मन में अपने प्रियतम भगवान् के सिवा अन्य किसी के होने की ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरे  का भजन कैसे करे ? वह तो चराचर विश्व को अपने प्रियतम का शरीर जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं -
   उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं।।
         रहीम कहते हैं कि आँखों में प्यारे की मधुर छबि ऐसी समां रही है कि दूसरी किसी छबि के लिये स्थान ही नहीं रह गया - यदि कोई उससे दूसरे की बात कहता है तो वह उसे सुनना ही नहीं चाहता या उसे सुनायी  ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती सुननी  पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं।शिवजी की अनन्योपासिका पार्वती जी को सप्तर्षियों ने महादेवजी के अनेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसदगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु में मन लगाने को कहा, तब शिवप्रेम की मूर्ति भगवती ने उत्तर दिया -
    
  जन्म कोटि लगि रगर हमारी। ब़रऊँ संभु न त रहऊँ कुआरी।।

महादेव अवगुन  भवन  बिष्णु  सकल गुन  धाम।
जेहि कर मनु राम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।
       
     इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान् को ही जानकर, उसी को सर्वस्व मानकर, जैसे मछली को केवल जल की आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान् का ही आश्रय लेकर सारी  चेष्टाएँ उसीके लिये करता है।

प्रेम-दर्शन [341]
          

निरन्तर नामस्मरण

॥श्रीहरि:॥

निरन्तर भगवान् का नामस्मरण होता रहे l इस से बढ़कर और क्या करना है l निरन्तर नामस्मरण ही भगवान् का सानिध्य प्राप्त कराने में पूर्ण समर्थ है l पाँच बातों का ख्याल रखिये - १- पापकर्म (कम-से-कम शरीर से तो न हो) l २- व्यर्थ चर्चा न हो l ३- किसी के साथ बुरा बर्ताव न हो l ४- भगवान् के नाम की विशेष चेष्टा रहे l ५- भगवत्कृपा पर विश्वास हो l आप विष्णु भगवान् की उपासना करते हैं सो बहुत उत्तम है l ध्यान के लिए समय कम मिलता है, जो कुछ कभी मिलता है - वह दूसरे-दूसरे चिन्तन में बीत जाता है, लिखा सो ठीक है l नामस्मरण यदि होता रहे तो वह ध्यान ही है l पाप न हो, विषय चिन्तन न हो, आलस्य प्रमाद में समय न बीते, संसार का मोह न हो, एकमात्र भगवद चिन्तन में लगे हुए ही सब काम हो - आपकी यह सभी कामनाएं बहुत ही सराहनीय तथा अत्यंत उत्तम हैं l परन्तु मेरे कुछ लिख देने से ही पूरी हो जाएँगी, ऐसी बात नहीं है l आप इन की आवश्यकता का पूरा अनुभव करेंगे और भगवत्कृपा पर विश्वास करके अध्यवसाय में लग जायेंगे तब भगवत्कृपा से ही ये पूरी होंगी l इस के लिए आप श्री भगवान् से प्रार्थना कीजिये l

पदरत्नाकर

पदरत्नाकर



॥श्रीहरि:॥

८३
प्रभु ! तुम अपनौ बिरद सँभारौ।
हौं अति पतित, कुकर्मनिरत, मुख मधु, मन कौ बहु कारौ॥
तृस्ना-बिकल, कृपन, अति पीडित, काम-ताप सौं जारौ।
तदपि न छुटत विषय-सुख-‌आसा, करि प्रयत्न हौं हारौ॥
अब तौ निपट निरासा छा‌ई, रह्यौ न आन सहारौ।
एक भरोसौ तव करुना कौ, मारौ चाहें तारौ॥

८४
प्रभु ! मोहि दे‌उ साँचौ प्रेम।
भजौं केवल तुमहि, तजि पाखंड, झूँठे नेम॥
जरै बिषय-कुबासना, मन जगै सहज बिराग।
होय परम अनन्य तुहरे पद-कमल-‌अनुराग॥
परम श्रद्धेय नित्यलीलालीन श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार भाईजी , पदरत्नाकर कोड- 50, गीता प्रेस , गोरखपुर

प्राणिमात्रके कल्याण

प्राणिमात्रके कल्याणके लिये जितना गहरा विचार हिन्दूधर्ममें किया गया है, उतना और किसी धर्ममें नहीं मिलता । हिन्दूधर्मके सभी सिद्धान्त पूर्णतया वैज्ञानिक और कल्याण करनेवाले हैं । अतः हिन्दूधर्म सर्वश्रेष्ठ है । हिन्दुओंकी वृद्धि आवश्यक क्यों ? हिन्दूधर्ममें मुक्ति, तत्त्वज्ञान, कल्याण, परमशान्ति, परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति जितनी सुगमतासे बतायी गयी है, उतनी सुगमतासे प्राप्तिकी बात ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध, यहूदी, पारसी आदि किसी भी धर्ममें नहीं सुनी गयी है । इसलिये मैं चाहता हूँ कि हिन्दुओंकी वृद्धि हो । कारण कि हिन्दूधर्मके अलौकिक, विलक्षण कथोंकी बातोंको हिन्दुओंके सिवाय और कौन सुनेगा और उनका आदर करेगा ? मुसलमानोंने तो हिन्दूधर्मके असंख्य अच्छे-अच्छे ग्रन्थोंको जला डाला । इसलिये आज वेदोंकी पूरी संहिता नहीं मिलती, सभी शास्त्र नहीं मिलते । इस कारण कितनी विलक्षण-विलक्षण विद्याएँ नष्ट हो गयीं, कला-कौशल नष्ट हो गये, जिनसे केवल हिन्दुओंको ही नहीं, संसारमात्रको लाभ पहुँचता । अब मुसलमानोंकी संख्या बढ़ रही है और हिन्दुओंकी संख्या घट रही है तो आगे चलकर क्या दशा होगी ? हिन्दुओंमें कोई-न-कोई तो हिन्दूधर्मके ग्रन्थोंको पढ़ेगा, पर जो हिन्दुओंके ग्रन्थोंको जला-जलाकर हमामका पानी गरम करते रहे, उन मुसलमानोंसे क्या ये आशा रखें कि वे हिन्दुओंके ग्रन्थोंको पढ़ेंगे ? जो हिन्दुओंका धर्म-परिवर्तन करके उनको मुसलमान या ईसाई बनानेमें लगे हुए हैं, उनसे क्या यह आशा की जाय कि वे हिन्दुओंके ग्रन्थोंका आदर करेंगे ? असम्भव है । इसी दृष्टिसे मैं हिन्दुओंमें परिवार-नियोजनका विरोध किया करता हूँ । वास्तवमें मेरा यह उद्देश्य बिलकुल नहीं है कि हिन्दुओंकी संख्या बढ़ जाय, जिससे उनको राज्य मिल जाय । मेरा उद्देश्य यह है कि मनुष्यका जल्दी और सुगमतासे कल्याण हो जाय । मैं कल्याणका पक्षपाती हूँ, राज्यका पक्षपाती नहीं । मेरे मनमें मुसलमानोंके प्रति किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं है । परन्तु वे हिन्दुओंका नाश करना चाहते हैं, इसलिये उनकी क्रिया मेरेको अच्छी नहीं लगती । कोई मेरेसे वैर, द्वेष रखनेवाला हो, मेरा बुरा करनेवाला हो, वह भी अगर मेरेसे अपने कल्याणकी बात पूछे तो मैं उसको वैसे ही बड़े प्रेमसे कल्याणका उपाय बताऊँगा, जैसे मैं अपनेमें श्रद्धा-प्रेम रखनेवालेको बताया करता हूँ । अगर कोई मुसलमान हृदयसे अपने कल्याणका उपाय पूछे तो मैं सबसे पहले उसको बताऊँगा, पीछे हिन्दूको बताऊँगा । मेरा कभी किसीसे भेदभाव रखनेका विचार है ही नहीं । (शेष आगेके ब्लॉगमें) ‒‘आवश्यक चेतावनी’ पुस्तकसे

राम राज्याभिषेक...

(राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति)

आज ही के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी। 

....राम राज्याभिषेक....

अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई। 
देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी। 
श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ  ॥ 

भगवान् के वचनसुनते ही सेवक जहाँ -तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया। 
फिर करुणानिधान श्री रामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया ॥

तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया। 
भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ 

फिर श्री रामजी ने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया। 
स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए। 
उनके (सुशोभित) अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गए ॥ 

(इधर) सासुओं ने जानकीजी को आदर के साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भली- भाँतिसजा दिए (पहना दिए) ॥

श्री राम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान रमा (श्री जानकीजी) शोभित हो रही हैं। 
उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥

(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए, उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानों पर चढ़कर सब देवता आनंदकंद भगवान् के दर्शन करने के लिए आए ॥ 

प्रभु को देखकर मुनि वशिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया। 
उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान था। 
उसका सौंदर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। 
ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्री रामचंद्रजी उस पर विराज गए ॥ 

श्री जानकीजी के सहित रघुनाथजी को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यंत ही हर्षित हुआ। 
तब ब्राह्मणों ने वेदमंत्रों का उच्चारण किया। 
आकाश में देवता और मुनि'जय, हो , जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥ 

(सबसे) पहले मुनि वशिष्ठजी ने तिलक किया। 
फिर उन्होंने सब ब्राह्मणों को (तिलक करने की ) आज्ञा दी। 
पुत्र को राजसिंहासन पर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥ 

उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए और संपूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। 
त्रिभुवन के स्वामी श्री रामचंद्रजी को (अयोध्या के) सिंहासन पर (विराजित) देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए ॥ 

आकाश में बहुत से नगाड़े बज रहे हैं। 
गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। 
अप्सराओं के झुंड के झुंड नाच रहे हैं। 
देवता और मुनि परमानंद प्राप्त कर रहे हैं। 
भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी , विभीषण, अंगद, हनुमान् और सुग्रीव आदि सहित क्रमशः छत्र, चँवर, पंखा , धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए हुए सुशोभित हैं ॥ 

श्री सीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्री रामजी के शरीर में अनेकों कामदेवों की छबि शोभा दे रही है। 
नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुंदर श्याम शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को भी मोहित कर रहा है। 
मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए हैं। 
कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥
 
हे पक्षीराज गरुड़जी ! वह शोभा , वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। 
सरस्वतीजी , शेषजी और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनंद) महादेवजी ही जानते हैं॥ 

सब देवताअलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए। 
तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥ 

कृपानिधानसर्वज्ञ प्रभु ने (उन्हें पहचानकर) उनका बहुत ही आदर किया। 
इसका भेद किसी ने कुछ भी नहीं जाना। 
वेद गुणगान करने लगे ॥ 

सगुण और निर्गुण रूप! 
हे अनुपम रूप- लावण्ययुक्त! 
हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो। 
आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। 
आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। 
हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो। 
मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥ 

हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता , राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए)दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं। 
हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि) से देख लिया , वे (माया जनित) तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गए। 
हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्री रामजी ! हमारी रक्षा कीजिए। 
हम आपको नमस्कार करते हैं॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से  मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव- दुर्लभ(देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। 
हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर (शिला बनी हुई) गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गई, जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जाने से घट्ठे पड़ गए हैं, हे मुकुन्द! 
हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं  ॥ 

वेदशास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है, 
जो (प्रवाह रूप से) अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं, जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है, जिसमें नित्य नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्व रूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥॥ 

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-(जो इस प्रकार कहकर उस) ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किंतु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। 
हे  करुणा के धाम प्रभो ! हे सद्गुणों की खान! 
हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें॥॥ 

वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। 
फिर वे अंतर्धान हो गए और ब्रह्मलोक को चले गए ॥ 

काकभुशुण्डिजी कहते हैं- हे गरुड़जी ! सुनिए, तब शिवजी वहाँ आए जहाँ श्री रघुवीर थे और गद्गद् वाणी से स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया-॥॥ 

हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकांत)! हे जन्म- मरण के संताप का नाश करने वाले! आपकी जय हो, आवागमन के भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिए। 
हे अवधपति ! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिए॥॥ 

हे दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्री रामजी! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गए॥॥ 

आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर आभूषण हैं, 
आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किए हुए हैं। 
महान् मद, मोह और ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह के नाश करने के लिए आप सूर्य के तेजोमय किरण समूह हैं ॥॥ 

कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरनों के हृदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। 
हे नाथ! हे (पाप- ताप का हरण करने वाले) हरे ! 
उसे मारकर विषय रूपी वन में भूल पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए ॥॥ 

लोग बहुत से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं। 
ये सब  आपके चरणों के निरादर के फल हैं। 
जो मनुष्य आपके चरणकमलों में प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागर में पड़े हैं  ॥ 

जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥॥ 

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ, न मान है, न मद। 
उनको संपत्ति सुख और विपत्ति (दुःख) समान है। 
इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिए त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥॥ 

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरंतर शुद्ध हृदय सेआपके चरणकमलों की सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदर को समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वी पर विचरते हैं ॥॥ 

हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्री रघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ) 
हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। 
आप जन्म-मरण रूपी रोग की महान् औषध और अभिमान के शत्रु हैं॥॥ 

आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं। 
आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ। 
हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख- दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए। 
हे पृथ्वी का पालन करने वाले राजन्। 
इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥॥ 

मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरण कमलों की अचल भक्ति और आपके भक्तों का सत्संग सदा प्राप्त हो। 
हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिए॥ 

श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलास को चले गए। 
तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाए ॥॥ 

हे गरुड़जी ! सुनिए यह कथा (सबको) पवित्र करने वाली है, (दैहिक, दैविक, भौतिक) तीनों प्रकार के तापों का और जन्म-मृत्यु के भयका नाश करने वाली है। 

महाराज श्री रामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र (निष्कामभाव से) सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥॥ 

और जो मनुष्य सकामभाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकार के सुख और संपत्ति पाते हैं। 
वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में श्री रघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं ॥॥ 

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे (क्रमशः ) भक्ति, मुक्ति और नवीन संपत्ति (नित्य नए भोग) पाते हैं। 
हे पक्षीराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो (जन्म- मरण) भय और दुःख हरने वाली है ॥॥ 

यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है तथा मोह रूपी नदी के (पार करने) के लिए सुंदर नाव है। 
अवधपुरी में नित नए मंगलोत्सव होते हैं। 
सभी वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं॥॥ 

श्री रामजी के चरणकमलों में- जिन्हें श्री शिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं, सबकी नित्य नवीन प्रीति है। 
भिक्षुकों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाए गए और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाए ॥॥

आज ही के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी ।

....राम राज्याभिषेक....

अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई।
देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी।
श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ ॥

भगवान् के वचनसुनते ही सेवक जहाँ -तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया।
फिर करुणानिधान श्री रामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया ॥

तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया।
भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥

फिर श्री रामजी ने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया।
स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए।
उनके (सुशोभित) अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गए ॥

(इधर) सासुओं ने जानकीजी को आदर के साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भली- भाँतिसजा दिए (पहना दिए) ॥

श्री राम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान रमा (श्री जानकीजी) शोभित हो रही हैं।
उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥

(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए, उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानों पर चढ़कर सब देवता आनंदकंद भगवान् के दर्शन करने के लिए आए ॥

प्रभु को देखकर मुनि वशिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया।
उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान था।
उसका सौंदर्य वर्णन नहीं किया जा सकता।
ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्री रामचंद्रजी उस पर विराज गए ॥

श्री जानकीजी के सहित रघुनाथजी को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यंत ही हर्षित हुआ।
तब ब्राह्मणों ने वेदमंत्रों का उच्चारण किया।
आकाश में देवता और मुनि'जय, हो , जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥

(सबसे) पहले मुनि वशिष्ठजी ने तिलक किया।
फिर उन्होंने सब ब्राह्मणों को (तिलक करने की ) आज्ञा दी।
पुत्र को राजसिंहासन पर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥

उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए और संपूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)।
त्रिभुवन के स्वामी श्री रामचंद्रजी को (अयोध्या के) सिंहासन पर (विराजित) देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए ॥

आकाश में बहुत से नगाड़े बज रहे हैं।
गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं।
अप्सराओं के झुंड के झुंड नाच रहे हैं।
देवता और मुनि परमानंद प्राप्त कर रहे हैं।
भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी , विभीषण, अंगद, हनुमान् और सुग्रीव आदि सहित क्रमशः छत्र, चँवर, पंखा , धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए हुए सुशोभित हैं ॥

श्री सीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्री रामजी के शरीर में अनेकों कामदेवों की छबि शोभा दे रही है।
नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुंदर श्याम शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को भी मोहित कर रहा है।
मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए हैं।
कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥

हे पक्षीराज गरुड़जी ! वह शोभा , वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता।
सरस्वतीजी , शेषजी और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनंद) महादेवजी ही जानते हैं॥

सब देवताअलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए।
तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥

कृपानिधानसर्वज्ञ प्रभु ने (उन्हें पहचानकर) उनका बहुत ही आदर किया।
इसका भेद किसी ने कुछ भी नहीं जाना।
वेद गुणगान करने लगे ॥

सगुण और निर्गुण रूप!
हे अनुपम रूप- लावण्ययुक्त!
हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो।
आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला।
आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया।
हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो।
मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥

हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता , राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए)दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं।
हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि) से देख लिया , वे (माया जनित) तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गए।
हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्री रामजी ! हमारी रक्षा कीजिए।
हम आपको नमस्कार करते हैं॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव- दुर्लभ(देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं।
हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर (शिला बनी हुई) गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गई, जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जाने से घट्ठे पड़ गए हैं, हे मुकुन्द!
हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं ॥

वेदशास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है,
जो (प्रवाह रूप से) अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं, जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है, जिसमें नित्य नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्व रूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥॥

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-(जो इस प्रकार कहकर उस) ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किंतु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं।
हे करुणा के धाम प्रभो ! हे सद्गुणों की खान!
हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें॥॥

वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की।
फिर वे अंतर्धान हो गए और ब्रह्मलोक को चले गए ॥

काकभुशुण्डिजी कहते हैं- हे गरुड़जी ! सुनिए, तब शिवजी वहाँ आए जहाँ श्री रघुवीर थे और गद्गद् वाणी से स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया-॥॥

हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकांत)! हे जन्म- मरण के संताप का नाश करने वाले! आपकी जय हो, आवागमन के भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिए।
हे अवधपति ! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिए॥॥

हे दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्री रामजी! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गए॥॥

आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर आभूषण हैं,
आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किए हुए हैं।
महान् मद, मोह और ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह के नाश करने के लिए आप सूर्य के तेजोमय किरण समूह हैं ॥॥

कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरनों के हृदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है।
हे नाथ! हे (पाप- ताप का हरण करने वाले) हरे !
उसे मारकर विषय रूपी वन में भूल पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए ॥॥

लोग बहुत से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं।
ये सब आपके चरणों के निरादर के फल हैं।
जो मनुष्य आपके चरणकमलों में प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागर में पड़े हैं ॥

जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥॥

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ, न मान है, न मद।
उनको संपत्ति सुख और विपत्ति (दुःख) समान है।
इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिए त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरंतर शुद्ध हृदय सेआपके चरणकमलों की सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदर को समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वी पर विचरते हैं ॥॥

हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्री रघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)
हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ।
आप जन्म-मरण रूपी रोग की महान् औषध और अभिमान के शत्रु हैं॥॥

आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं।
आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ।
हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख- दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए।
हे पृथ्वी का पालन करने वाले राजन्।
इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥॥

मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरण कमलों की अचल भक्ति और आपके भक्तों का सत्संग सदा प्राप्त हो।
हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिए॥

श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलास को चले गए।
तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाए ॥॥

हे गरुड़जी ! सुनिए यह कथा (सबको) पवित्र करने वाली है, (दैहिक, दैविक, भौतिक) तीनों प्रकार के तापों का और जन्म-मृत्यु के भयका नाश करने वाली है।

महाराज श्री रामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र (निष्कामभाव से) सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥॥

और जो मनुष्य सकामभाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकार के सुख और संपत्ति पाते हैं।
वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में श्री रघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं ॥॥

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे (क्रमशः ) भक्ति, मुक्ति और नवीन संपत्ति (नित्य नए भोग) पाते हैं।
हे पक्षीराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो (जन्म- मरण) भय और दुःख हरने वाली है ॥॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है तथा मोह रूपी नदी के (पार करने) के लिए सुंदर नाव है।
अवधपुरी में नित नए मंगलोत्सव होते हैं।
सभी वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं॥॥

श्री रामजी के चरणकमलों में- जिन्हें श्री शिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं, सबकी नित्य नवीन प्रीति है।
भिक्षुकों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाए गए और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाए ॥॥